
उत्तर प्रदेश में क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के सख्त पालन और O.P.D. फीस की समय-सीमा तय करे सरकार —-अशोक बालियान
उत्तर प्रदेश में क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के सख्त पालन और O.P.D. फीस की समय-सीमा तय करे सरकार —-अशोक बालियान

मुजफ्फरनगर, 11 मई।
पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन के चेयरमैन अशोक बालियान ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र भेजकर प्रदेश में “क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट” के प्रभावी क्रियान्वयन तथा मरीजों के हित में महत्वपूर्ण सुधार लागू करने की मांग की है। उन्होंने विशेष रूप से डॉक्टरों की परामर्श शुल्क (O.P.D. Fees) की समय-सीमा निर्धारित करने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
अशोक बालियान ने अपने पत्र में उल्लेख किया कि उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा “यूपी क्लिनिकल प्रतिष्ठान (पंजीकरण और विनियमन) नियम, 2016” को 11 जुलाई 2016 को लागू किया गया था। इस अधिनियम का उद्देश्य प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं को पारदर्शी, जवाबदेह और मरीज हितैषी बनाना था, लेकिन वर्तमान समय में इसके कई महत्वपूर्ण प्रावधानों का सही तरीके से पालन नहीं हो रहा है। इसके कारण आम मरीजों को आर्थिक, मानसिक और व्यावहारिक परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
उन्होंने कहा कि सबसे बड़ी समस्या डॉक्टरों द्वारा ली जाने वाली O.P.D. फीस की वैधता अवधि तय न होना है। वर्तमान में मरीजों को हर बार अस्पताल या क्लिनिक जाने पर दोबारा परामर्श शुल्क देना पड़ता है, जिससे उन पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ता है। उन्होंने मांग की कि एक बार ली गई परामर्श फीस के अंतर्गत कम से कम 15 दिनों की अवधि में दो बार फॉलो-अप परामर्श की सुविधा मरीजों को मिलनी चाहिए।
इसके अलावा उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश के अधिकांश निजी अस्पतालों और क्लिनिकों में ड्यूटी पर तैनात डॉक्टरों के नाम एवं उनकी योग्यता स्पष्ट रूप से प्रदर्शित नहीं की जाती। साथ ही इलाज, जांच, ऑपरेशन, बेड तथा अन्य स्वास्थ्य सेवाओं की शुल्क सूची हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में प्रदर्शित करने का नियम होने के बावजूद उसका पालन नहीं हो रहा है।
उन्होंने कहा कि कई अस्पतालों में मरीजों और उनके परिजनों के बैठने के लिए पर्याप्त प्रतीक्षालय की व्यवस्था भी नहीं होती, जिससे उन्हें भारी असुविधा उठानी पड़ती है। वहीं डॉक्टरों द्वारा दवाओं के नाम ब्लॉक लेटर में और जेनेरिक नामों के साथ लिखने के नियम का भी व्यापक स्तर पर उल्लंघन किया जा रहा है।
अशोक बालियान ने यह भी कहा कि कई निजी अस्पताल आपातकालीन स्थिति में मरीजों को भर्ती करने से बचते हैं, जो मानवीय दृष्टिकोण के साथ-साथ नियमों के भी विरुद्ध है। इसके अलावा OPD और IPD रिकॉर्ड के डिजिटलीकरण तथा स्वास्थ्य विभाग को नियमित रिपोर्ट भेजने की व्यवस्था भी प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पा रही है।
उन्होंने गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि कुछ मामलों में बकाया बिल के कारण मृत मरीजों के शव रोकने जैसी अमानवीय घटनाएं भी सामने आती हैं, जो अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण हैं।
अंत में उन्होंने मुख्यमंत्री से मांग की कि प्रदेश में स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए क्लिनिकल एस्टेब्लिशमेंट एक्ट के नियमों में आवश्यक संशोधन किए जाएं तथा उनके सख्ती से पालन हेतु प्रभावी दिशा-निर्देश जारी किए जाएं, ताकि मरीजों को राहत मिल सके और स्वास्थ्य सेवाओं में विश्वास मजबूत हो।











