
यूजीसी जैसे नीतिगत मुद्दों पर सड़क की राजनीति से क्या हिंदू समाज में बढ़ रहा जातीय विभाजन? अशोक बालियान बोले—नीतिगत असहमति लोकतांत्रिक अधिकार, लेकिन समाज को जातियों में बांटने की कोशिशों पर गंभीर मंथन जरूरी
यूजीसी जैसे नीतिगत मुद्दों पर सड़क की राजनीति से क्या हिंदू समाज में बढ़ रहा जातीय विभाजन?
अशोक बालियान बोले—नीतिगत असहमति लोकतांत्रिक अधिकार, लेकिन समाज को जातियों में बांटने की कोशिशों पर गंभीर मंथन जरूरी

मुजफ्फरनगर। विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों से जुड़े प्रशासनिक एवं नीतिगत मुद्दों को लेकर चल रहे विवादों के बीच पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन के चेयरमैन अशोक बालियान ने सवाल उठाया है कि क्या ऐसे मुद्दों पर सड़क पर होने वाले आंदोलनों से हिंदू समाज की एकता मजबूत हो रही है या जातीय आधार पर विभाजन की स्थिति पैदा हो रही है। उन्होंने कहा कि सरकार की नीतियों से असहमति जताना और संवैधानिक तरीके से विरोध करना लोकतांत्रिक अधिकार है, लेकिन विरोध के दौरान समाज में जातीय वैमनस्य बढ़ाने वाले विमर्श से बचना चाहिए।
बालियान ने हालिया आईआईटी बॉम्बे प्रकरण का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षण संस्थानों में अनुशासन बनाए रखना और छात्रों के अधिकारों की रक्षा—दोनों के बीच संतुलन आवश्यक है। सितंबर में आईआईटी बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोडे की आत्महत्या के बाद परीक्षा में मोबाइल फोन के कथित इस्तेमाल, अनुशासनात्मक कार्रवाई और जातिगत भेदभाव के आरोपों को लेकर विवाद सामने आया। पुलिस ने प्रोफेसर के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने और एससी/एसटी अधिनियम से संबंधित धाराओं में मामला दर्ज किया है। मामले की जांच जारी है और विभिन्न पक्षों के दावे अलग-अलग हैं।
उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थितियों में किसी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले निष्पक्ष जांच और कानूनी प्रक्रिया को पूरा होने देना जरूरी है। दूसरी ओर, आईआईटी के कई फैकल्टी सदस्यों ने भी प्रोफेसर के समर्थन में बयान जारी करते हुए परीक्षा में अनुशासन और छात्रों के लिए संवेदनशील प्रक्रियाओं की जरूरत पर जोर दिया है।
अशोक बालियान ने यूजीसी (Promotion of Equity in Higher Education Institutions) Regulations, 2026 को लेकर हुए विवाद का भी उल्लेख किया। यूजीसी ने इन नियमों को 13 जनवरी 2026 को प्रकाशित किया था। बाद में 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इनके क्रियान्वयन को अगले आदेश तक स्थगित करते हुए 2012 के नियमों को प्रभावी रखने का निर्देश दिया। अदालत ने प्रथमदृष्टया कुछ प्रावधानों में अस्पष्टता और संभावित दुरुपयोग की आशंका संबंधी सवाल उठाए थे।
बालियान के अनुसार, इस मुद्दे पर समाज के विभिन्न वर्गों में अलग-अलग धारणाएं बनीं और इसे लेकर विरोध-प्रदर्शन भी हुए। उनका कहना है कि किसी भी नियम की आलोचना उसके वास्तविक प्रावधानों, कानूनी प्रभाव और व्यावहारिक परिणामों के आधार पर होनी चाहिए, न कि ऐसे विमर्श के आधार पर जिससे एक जाति या सामाजिक वर्ग दूसरे के विरुद्ध खड़ा दिखाई दे।
उन्होंने कहा कि संत समाज और हिंदू संगठनों को भी इस विषय पर गंभीरता से विचार करना चाहिए कि सामाजिक और प्रशासनिक मुद्दों पर उनकी प्रतिक्रिया समाज में समरसता बढ़ाने वाली हो। उनके मुताबिक, सरकार की किसी नीति का विरोध करना अलग बात है, जबकि उस विरोध को जातीय पहचान के संघर्ष में बदल देना अलग विषय है।
बालियान ने कहा कि यूजीसी नियमों का मामला अब न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के अनुसार 2012 का नियामकीय ढांचा फिलहाल प्रभावी है। ऐसे में आंदोलन और विरोध के साथ-साथ तथ्यात्मक विमर्श, कानूनी प्रक्रिया और सामाजिक संवाद को भी महत्व दिया जाना चाहिए।
उन्होंने अंत में सवाल उठाया कि यूजीसी जैसे प्रशासनिक एवं नीतिगत विषयों पर होने वाले आंदोलनों का उद्देश्य केवल नीति में बदलाव की मांग होना चाहिए या वे अनजाने में समाज को जातीय खांचों में बांटने का कारण भी बन सकते हैं? उन्होंने संत समाज, सामाजिक संगठनों और शिक्षण जगत से इस पर खुले और तथ्यपरक संवाद की आवश्यकता बताई।











