हिंदी पत्रकारिता के कड़वे सच हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष — डॉ. अनुज अग्रवाल

हिंदी पत्रकारिता के कड़वे सच
हिंदी पत्रकारिता दिवस पर विशेष
— डॉ. अनुज अग्रवाल

Oplus_16908288

एक समय था जब पत्रकारिता को केवल पेशा नहीं, बल्कि एक मिशन माना जाता था। पत्रकार समाज और राष्ट्र के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को सर्वोपरि रखते थे। हिंदी पत्रकारिता दिवस पर जब हम पत्रकारिता के इतिहास और वर्तमान स्वरूप पर दृष्टि डालते हैं, तो अनेक प्रेरणादायक पहलुओं के साथ कुछ चिंताजनक सच्चाइयाँ भी सामने आती हैं।
कहा जाता है कि जब आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ‘सरस्वती’ पत्रिका का संपादन करते थे, तब एक व्यक्ति अपनी रचना प्रकाशित कराने के उद्देश्य से उनसे मिलने पहुंचा। वह अपने गांव का गुड़ भी उनके लिए लेकर आया था। गांव और गुड़ दोनों से विशेष लगाव होने के बावजूद जब आचार्य द्विवेदी ने उसकी रचना पढ़ी तो वह पत्रिका के स्तर के अनुरूप नहीं लगी। उन्होंने रचना प्रकाशित नहीं की। बाद में जब उस व्यक्ति ने रचना न छपने और गुड़ के बारे में पूछा तो आचार्य द्विवेदी वही गुड़ वापस लाकर बोले—“आपका गुड़ अच्छा होगा, लेकिन मैं संबंधों या उपहारों के आधार पर रचनाएं प्रकाशित नहीं कर सकता।”
यह प्रसंग पत्रकारिता के उन आदर्शों का प्रतीक है, जिनके आधार पर हिंदी पत्रकारिता ने समाज में विश्वास अर्जित किया। पत्रकारिता को जनसेवा, निष्पक्षता और सत्य के माध्यम के रूप में स्थापित करने में अनेक पत्रकारों ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। लेकिन समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती चली गईं।
आज पत्रकारिता पर व्यवसायिकता का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है। बड़े उद्योग समूहों का बढ़ता नियंत्रण, राजनीतिक प्रभाव, विज्ञापन आधारित व्यवस्था और निजी हितों की पूर्ति के लिए मीडिया के उपयोग जैसी प्रवृत्तियाँ पत्रकारिता के मूल उद्देश्य को प्रभावित कर रही हैं। कई बार समाचार माध्यमों का उपयोग जनहित से अधिक प्रभाव और सत्ता प्राप्त करने के साधन के रूप में दिखाई देता है।
विशेष रूप से क्षेत्रीय और स्थानीय पत्रकारिता अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। प्रतिस्पर्धा इतनी अधिक बढ़ गई है कि कई स्थानों पर पत्रकारिता का मूल उद्देश्य पीछे छूटता दिखाई देता है। समाचारों की गुणवत्ता, तथ्यपरकता और संवेदनशीलता पर सवाल उठने लगे हैं। इंटरनेट और एजेंसियों पर अत्यधिक निर्भरता के कारण मौलिक लेखन और खोजी पत्रकारिता कमजोर होती जा रही है।
आज बड़ी संख्या में समाचार प्रेस विज्ञप्तियों और तथाकथित ‘टेबल न्यूज’ के आधार पर प्रकाशित हो रहे हैं। घटनास्थल पर जाकर तथ्य जुटाने की परंपरा कमजोर हुई है। वहीं, तेजी और सनसनी की होड़ में कई बार मानवीय संवेदनाओं की भी अनदेखी हो जाती है। अपराध और संवेदनशील घटनाओं की रिपोर्टिंग में मर्यादा और जिम्मेदारी का अभाव भी चिंता का विषय है।
पत्रकारिता के क्षेत्र में संपर्क, प्रभाव और आर्थिक शक्ति का असर भी लगातार बढ़ा है। कई प्रतिभाशाली और निष्पक्ष लेखकों को अपेक्षित अवसर नहीं मिल पाते, जबकि प्रभावशाली लोगों को आसानी से मंच उपलब्ध हो जाता है। हालांकि पूरी तस्वीर निराशाजनक भी नहीं है।
आज भी अनेक पत्रकार और मीडिया संस्थान ईमानदारी के साथ जनहित के मुद्दे उठा रहे हैं। लोकतंत्र को मजबूत करने, जनता को जागरूक करने और सामाजिक सरोकारों को सामने लाने में मीडिया की महत्वपूर्ण भूमिका बनी हुई है। साहित्य, संस्कृति और रचनात्मक अभिव्यक्ति को भी अनेक समाचार पत्र और पत्रिकाएँ आज भी सम्मानपूर्वक स्थान दे रही हैं।
दरअसल, पत्रकारिता की वास्तविक आत्मा संवेदनशीलता, निष्पक्षता और जनहित में निहित है। यदि पत्रकारिता इन मूल्यों को बनाए रखे, तो उसका मिशनरी स्वरूप आज भी जीवित रह सकता है। हिंदी पत्रकारिता दिवस केवल उत्सव का अवसर नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी दिन है—ताकि पत्रकारिता एक बार फिर समाज के विश्वास की मजबूत आधारशिला बन सके।
यह संस्करण अखबार के फीचर लेख या विशेषांक के लिए उपयुक्त शैली में तैयार किया गया है।


जवाब जरूर दे 

आप अपने सहर के वर्तमान बिधायक के कार्यों से कितना संतुष्ट है ?

View Results

Loading ... Loading ...


Related Articles