विवाहेतर संबंध सामाजिक ताने-बाने के लिए घातक : अशोक बालियान

विवाहेतर संबंध सामाजिक ताने-बाने के लिए घातक : अशोक बालियान


मुज़फ्फरनगर, 16 मई। पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन के चेयरमैन अशोक बालियान ने कहा कि हिंदू धर्म में विवाहेतर संबंध (एडल्ट्री/व्यभिचार) को महापाप माना गया है और यह पारिवारिक व सामाजिक व्यवस्था को कमजोर करने वाला कृत्य है। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन से जुड़े लोगों के आचरण का समाज पर व्यापक प्रभाव पड़ता है, इसलिए उन्हें नैतिक मूल्यों का पालन करना चाहिए।
अशोक बालियान ने पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के पुत्र प्रतीक यादव की असमय मृत्यु पर दुख व्यक्त करते हुए कहा कि उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि लंबे समय तक चर्चा का विषय रही। उन्होंने कहा कि साधना गुप्ता का पहला विवाह वर्ष 1986 में फर्रुखाबाद निवासी चंद्र प्रकाश गुप्ता से हुआ था और वर्ष 1987 में प्रतीक यादव का जन्म हुआ। बाद में वर्ष 1990 में साधना गुप्ता और चंद्र प्रकाश गुप्ता के बीच तलाक हो गया। उन्होंने कहा कि वर्ष 2003 में मालती देवी के निधन के बाद मुलायम सिंह यादव ने सार्वजनिक रूप से साधना गुप्ता को अपनी दूसरी पत्नी तथा वर्ष 2007 में प्रतीक यादव को अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया था।
अशोक बालियान ने कहा कि समाज में अक्सर यह प्रश्न उठता है कि विवाहेतर संबंधों से जन्मी संतानों को वैसी सामाजिक स्वीकृति क्यों नहीं मिल पाती जैसी वैध वैवाहिक संबंधों से जन्मी संतानों को मिलती है। उन्होंने कहा कि इसी प्रकार का मामला पूर्व मुख्यमंत्री एन.डी. तिवारी और उनके कथित जैविक पुत्र रोहित शेखर के संबंध में भी सामने आया था, जिसने देशभर में व्यापक चर्चा को जन्म दिया था।
उन्होंने कहा कि विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार प्रारंभिक स्कूल अभिलेखों में प्रतीक यादव के पिता के रूप में चंद्र प्रकाश गुप्ता का नाम दर्ज था, जबकि बाद के वर्षों में मुलायम सिंह यादव का नाम अंकित किया गया। बालियान ने दावा किया कि किसी हलफनामे या सामाजिक स्वीकारोक्ति से जैविक अथवा कानूनी पितृत्व स्वतः परिवर्तित नहीं हो जाता। इसके लिए हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 तथा केंद्रीय दत्तक ग्रहण संसाधन प्राधिकरण (CARA) के तहत विधिक प्रक्रिया पूरी करना आवश्यक होता है।
उन्होंने कहा कि हिंदू धर्मग्रंथों में पारिवारिक निष्ठा को धर्म की आधारशिला माना गया है। सर विलियम जोन्स द्वारा किए गए मनुस्मृति के अंग्रेजी अनुवाद तथा अन्य धर्मग्रंथों के संदर्भ देते हुए उन्होंने कहा कि विवाहित रहते हुए किसी अन्य पुरुष या स्त्री से संबंध बनाना धार्मिक दृष्टि से गंभीर पाप माना गया है। बालियान ने यह भी कहा कि वर्ष 1987 के समय भारतीय दंड संहिता की धारा 497 के अंतर्गत विवाहेतर संबंध दंडनीय अपराध की श्रेणी में आते थे।
अशोक बालियान ने कहा कि भले ही बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 497 को असंवैधानिक घोषित कर दिया हो, लेकिन नैतिक और सामाजिक दृष्टि से विवाह संस्था की पवित्रता आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि सेना, नौसेना और वायुसेना में आज भी अनुशासन बनाए रखने के लिए एडल्ट्री के मामलों में विभागीय कार्रवाई की व्यवस्था है।
उन्होंने कहा कि समाज को मजबूत बनाने के लिए परिवार व्यवस्था का सुदृढ़ होना आवश्यक है। सार्वजनिक जीवन जीने वाले नेताओं, अधिकारियों और प्रभावशाली व्यक्तियों को अपने आचरण से समाज के सामने आदर्श प्रस्तुत करना चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियां नैतिक मूल्यों और पारिवारिक संस्कारों के प्रति जागरूक रह सकें।


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