क्रोध पर नियंत्रण न हो, तो परिवार भी बर्बाद हो सकते हैं — अशोक बालियान, चेयरमैन, पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन

क्रोध पर नियंत्रण न हो, तो परिवार भी बर्बाद हो सकते हैं
— अशोक बालियान, चेयरमैन, पीजेंट वेलफेयर एसोसिएशन

दिनांक: 15-02-2026 | स्थान: मुजफ्फरनगर
उत्तर प्रदेश के जनपद रामपुर में हाल ही में घटी एक दुखद घटना ने समाज को झकझोर कर रख दिया है। जिला पंचायत कार्यालय में मामूली विवाद ने इतना भयावह रूप ले लिया कि एक व्यक्ति की जान चली गई और दो परिवारों की खुशियां पल भर में उजड़ गईं। यह घटना केवल एक आपराधिक मामला नहीं, बल्कि अनियंत्रित क्रोध के खतरनाक परिणामों का जीवंत उदाहरण है।
प्राप्त जानकारी के अनुसार, कार्यालय में एक कर्मचारी को देर से आने पर टोका गया। इस बात से उपजा विवाद इतना बढ़ा कि संबंधित महिला कर्मचारी ने अपने अधिवक्ता पति को कार्यालय बुला लिया। वहां पहुंचकर आवेश में आकर अधिवक्ता द्वारा लिपिक को थप्पड़ मारना और हाथापाई करना स्थिति को और भड़का गया। देखते ही देखते तनाव इतना बढ़ा कि लिपिक ने अपनी लाइसेंसी पिस्टल से गोली चला दी, जिससे अधिवक्ता की मृत्यु हो गई। एक क्षणिक आवेश ने जीवनभर का पछतावा दे दिया।
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या यह सब अचानक हुआ? वस्तुतः, क्रोध कभी अचानक नहीं फूटता; वह भीतर पनपता है—असंतोष, तनाव, अहंकार, अवसाद और कभी-कभी नशे की प्रवृत्ति के कारण। जब व्यक्ति मानसिक रूप से असंतुलित या तनावग्रस्त होता है, तो उसकी प्रतिक्रिया सामान्य परिस्थितियों से कहीं अधिक तीखी हो सकती है। अनियमित शराब सेवन और मानसिक अवसाद भी क्रोध को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
समाज में आज संवाद की संस्कृति कमजोर होती जा रही है। लोग तुरंत प्रतिक्रिया (React) देने में विश्वास करते हैं, जबकि जरूरत है ठहरकर सोचने (Pause) और समझदारी से उत्तर देने (Respond) की। यदि उस क्षण कोई भी पक्ष धैर्य रखता, संवाद का मार्ग अपनाता या वरिष्ठ अधिकारियों को हस्तक्षेप करने देता, तो शायद यह घटना टल सकती थी।
क्रोध केवल व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि उसके पूरे परिवार को प्रभावित करता है। एक पल की भूल बच्चों के भविष्य पर गहरा प्रभाव छोड़ सकती है। परिवार सामाजिक इकाई की आधारशिला है, और जब परिवार टूटते हैं तो समाज भी कमजोर होता है। इसलिए आत्म-नियंत्रण केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी भी है।
आज आवश्यकता है कि विद्यालयों, कार्यालयों और परिवारों में भावनात्मक शिक्षा (Emotional Education) और तनाव प्रबंधन को बढ़ावा दिया जाए। योग, ध्यान, परामर्श और मनोचिकित्सकीय सहायता को सामान्य माना जाए, न कि शर्म की बात। यदि किसी व्यक्ति को बार-बार अत्यधिक गुस्सा आता है, तो उसे मनोचिकित्सक या काउंसलर की सलाह अवश्य लेनी चाहिए। मानसिक स्वास्थ्य उतना ही महत्वपूर्ण है जितना शारीरिक स्वास्थ्य।
यह घटना हमें चेतावनी देती है कि क्रोध पर नियंत्रण न हो, तो परिणाम विनाशकारी हो सकते हैं। धैर्य, संवाद और आत्म-संयम ही स्वस्थ समाज की नींव हैं। हमें अपने परिवारों और आने वाली पीढ़ियों के लिए ऐसी संस्कृति विकसित करनी होगी, जहां असहमति हो सकती है, पर हिंसा नहीं; जहां मतभेद हों, पर मनभेद नहीं। यही एक सभ्य और संवेदनशील समाज की पहचान है।


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